आनंद शीला 1981 से 1985 तक ओशो रजनीश की सचिव थी। इन चार साल में उसने ओशो को कई बार मारने का प्रयास किया। यही नहीं, ओशो तक पहुंच बनाने और कम्यून की सर्वेसर्वा बनने के लिए उसने ओशो संन्यासियों को धीमा जहर देकर मारने का भी प्रयास किया।

 मां आनंद शीला 1981 से 1985 तक ओशो रजनीश की सचिव थी। इन चार साल में उसने ओशो को कई बार मारने का प्रयास किया। यही नहीं, ओशो तक पहुंच बनाने और कम्यून की सर्वेसर्वा बनने के लिए उसने ओशो संन्यासियों को धीमा जहर देकर मारने का भी प्रयास किया।


सत्ता और ध्यान मिलने की अपने लालच को छोड़कर शीला का एक अन्य प्रयोजन भी था ओशो रजनीश का खात्मा करने के लिए सरकार की मदद करना। लेकिन रजनीश के खात्मे तक भी शीला के कम्यून की सर्वेसर्वा बने रहने की योजना सफल नहीं हो पाई।


सू एपलटन लिखती है, 'जहर दिए जाने के क्रियाकलाप रजनीशपुरम् में बढ़ गए थे। देवराज और विवेक दोनों को ही शीला के घर पर चाय अथवा कॉफी में जहर दिया गया और देवराज को एक बार कम्यून के रेस्तरां में भोजन करते समय जहर दिया गया।'


सू एपलटन के अनुसार शीला एक संदिग्ध महिला थी। वह बेहद ही महत्वाकांक्षी लेकिन कुंठाग्रस्त महिला होने के साथ-साथ और भी बहुत कुछ थी। कुछ वर्ष आर्ट स्कूल में और होटल में वेट्रेस का कार्य करने के बाद वह ओशो की संन्यासी बन गई। पूना में पहले वह लक्ष्मी की सहायक के रूप में नियुक्त हुई। लक्ष्मी की दूसरी सहायक अरूप से वह जलन रखती थी। लक्ष्मी ओशो की सचिव थी और शीला लक्ष्मी की जगह लेने के लिए कम्यून का माहौल खराब करने लगी थी।


शीला लोगों को प्रोत्साहित करती थी कि कोई भी मसला लक्ष्मी के पास न जाकर पहले मेरे पास आए। शीला ने लक्ष्मी और अरूप को हाशिए पर धकेलकर खुद की शक्ति बढ़ाना शुरू कर दी थी। जब शीला ने सचिव का पद हथिया लिया तो उसकी महत्वाकांक्षा को पर लग गए थे।


सू एपलटन के अनुसार शीला की युवावस्था में उसके साथ बलात्कार हुआ था इसीलिए वह पुरुषों के साथ कभी भी अपने संबंध सहज नहीं बना पाई। यही कारण था कि उसने अपने पति जे. को छोड़ दिया था और अपने आसपास समलैंगिक पुरुषों की भीड़ बढ़ा ली थी। शीला की हरकतों के कारण वह कम्यून में चर्चा के केंद्र में आ गई थी।


शीला विश्वप्रसिद्ध बनना चाहती थी और कम्यून की सारी संपत्ति पर अपना अधिकार रखना चाहती थी। इसके लिए वह जो भी कर सकती थी उसने किया।

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मां आनंद शीला 1981 में रजनीश की सचिव बन गई। इसके बाद उसकी महत्वाकांक्षा को पर लग गए थे। सत्ता और ध्यान मिलने की अपनी लिप्सा को छोड़कर शीला का एक अन्य प्रयोजन भी था ओशो रजनीश का खात्

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