जब तक एक भी मनुष्य पृथ्वी पर है, संन्यास के फूल खिलते रहेंगे।
मैं तुम्हें
सत्य नहीं दे सकता,
परंतु मैं तुम्हें चांद की ओर दिखा सकता हूं…
कृपा करके मेरी अंगुली से आसक्त मत हो जाना
जो चांद की ओर इशारा कर रही है।
यह अंगुली विदा हो जाएगी। चांद रहेगा,
और खोज जारी रहेगी।
और जब तक एक भी मनुष्य पृथ्वी पर है,
संन्यास के फूल खिलते रहेंगे।
पहली बात,
मनुष्य के पूरे इतिहास में
मैं अकेला व्यक्ति हूं
जिसने तुम्हें वैयक्तिक निजता दी है।
तथाकथित गुरु बिलकुल उलटा कर रहे थे:
वे तुम्हारी वैयक्तिक निजता छीन रहे थे।
उनका सारा प्रयत्न यह होता था कि
तुम उन्हें समर्पण कर दो।
कि तुम्हारा काम था केलव उनके चरण छूना
और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना।
मेरा प्रयास बिलकुल अलग है।
तुम किसी के चरण छूने से
कोई आशीर्वाद नहीं प्राप्त कर सकते।
बल्कि उलटे तुम उस आदमी को
अधिक अहंकारी तथा रुग्ण बना रहे हो।
अहंकार उसकी आत्मा का कैंसर है।
किसी को रुग्ण मत बनाओ।
करुणावान बनो!
कभी किसी के चरण मत छूओ।
मेरा प्रयत्न है कि
तुम्हारे मन से सभी परंपराएं, मतांधताएं,
अंधविश्वास, मान्यताएं छीन लिए जाएं
ताकि तुम अ-मन की दशा को उपलब्ध हो सको…
मौन की चरम अवस्था
जहां एक विचार भी नहीं उठता,
जहां तुम्हारी चेतना की झील में
एक लहर भी नहीं होती।
और यह सब
कुछ तुम्हारे द्वारा किया जाना है।
मैं नहीं कह रहा हूं
कि
“केवल मेरा अनुकरण करो।
मैं तुम्हारा उद्धारकर्ता हूं।
मैं तुम्हें बचा लूंगा।”
यह सब कूड़ा-करकट है।
तुम्हारे स्वयं के अतिरिक्त
तुम्हें कोई बचा नहीं सकता।
और केवल आत्मिक स्वतंत्रता ही
स्वतंत्रता कहलाने योग्य स्वतंत्रता है।
आचार्य श्री रजनीश
The Last Testament, भाग 6, प्रवचन 14
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