ओशो पिरामिड ध्यान आश्रम मदनपुर के दैनिक संध्या सत्संग में वही छूटा हुआ प्रश्नोत्तर प्रवचन
मित्रो आपको स्मरण होगा कि अष्टावक्र प्रवचन माला के प्रवचन भेजने के क्रम में ३३ वा सूत्रों पर हुए प्रवचन के बाद प्रश्नोत्तर ३४ वा प्रवचन किसी कारण से न भेजकर मैंने सीधे पुनः सूत्रों पर ही ३५ वा प्रवचन भेजा था उसके बाद प्रश्नोत्तर प्रवचन ३६वा भी भेज दिया था आज बुधवार १९ अक्टूबर २२ को ओशो पिरामिड ध्यान आश्रम मदनपुर के दैनिक संध्या सत्संग में वही छूटा हुआ प्रश्नोत्तर प्रवचन का पूर्वार्द्ध ४५ मिनट सुना गया लेकिन पूरा प्रवचन भेज रहा हूं ताकि अपने सुविधानुसार कल तक इसी प्रश्नोत्तर प्रवचन को आप सुन सकें। आज का पहला प्रश्न पूछा गया कि पहले प्रवचन के अंत में आप हम सुनने वालों को कहते थे आपके भीतर बैठे हुए परमात्मा को प्रणाम करता हूं अब नहीं कहते। क्या आपको अब हमारे भीतर परमात्मा नहीं दिखता? या आपको भगवान् कहने के कारण नहीं कहते हैं? उत्तर में ओशो कहते हैं मैने पहले क्या क्या कहा है आप उसकी बात न करें क्योंकि मैं भी फिक्र नहीं करता। मै इसी क्षण जो बोल रहा हू उसी के लिए जिम्मेदार हूं। मै अपनी स्वतंत्रता मे बोलता हूं आपके आकांक्षा पूर्ति के लिए नहीं। अब मुझे लगा कि उसका आप पर कोई असर नहीं होता इसलिए वैसा कहना बन्द कर दिया। उससे पहले प्रश्न मे पूछा गया था कि आप पहले साधकों को कहते थे ध्यान आवश्यक है अब कहते हैं ध्यान के गोरखधंधे में न पड़ें उससे साधकों को दुविधा होती है। इसके उत्तर में ओशो कहते हैं कि जब तक दुविधा है तब तक ध्यान आवश्यक है।
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