जैसी कोई चीज की स्वीकृति हमें बहुत कठिन मालूम पड़ती है। जो हमें दिखाई पड़ता है वही सत्य है; जो नहीं दिखाई पड़ता वह हमारे लिए असत्य हो जाता है।
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देवता जैसी कोई चीज की स्वीकृति हमें बहुत कठिन मालूम पड़ती है। जो हमें दिखाई पड़ता है वही सत्य है; जो नहीं दिखाई पड़ता वह हमारे लिए असत्य हो जाता है।
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और देवता उस अस्तित्व का नाम है, जो हमें साधारणतः दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन थोड़ा सा भी श्रम किया जाए तो उस लोक के अस्तित्व को भी देखा जा सकता है, उससे संबंधित भी हुआ जा सकता है।
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और साधारणतः यह खयाल है, साधारणतः यह खयाल है कि देवता कहीं और, प्रेत कहीं और रहते हैं, हम कहीं और। यह बात एकदम ही गलत है। जहां हम रह रहे हैं, ठीक वहीं देव भी हैं, प्रेत भी हैं। *प्रेत वे आत्माएं हैं, जो इतनी निकृष्ट हैं कि मनुष्य होने की सामर्थ्य उन्होंने खो दी है* और नीचे उतरने का कोई उपाय नहीं है। मनुष्य से नीचे की योनियों में जाने का कोई उपाय नहीं है। और मनुष्य होने की सामर्थ्य भी उन्होंने खो दी है। तो वे एक कठिनाई में हैं, वे नीचे की योनियों में जा नहीं सकतीं, मनुष्य की देह उन्हें उपलब्ध नहीं होती।
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ऐसी आत्माएं प्रतीक्षा करेंगी तब तक, जब तक या तो उनके योग्य गर्भ उन्हें उपलब्ध हो जाए, या उनके जीवन में परिवर्तन हो, रूपांतरण हो और वे जन्म ग्रहण कर सकें।
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*देवता वे आत्माएं हैं, जो मनुष्य से ऊपर उठ गई हैं, लेकिन मोक्ष को उपलब्ध करने की सामर्थ्य उनकी नहीं है।* यह अब प्रतीक्षा में जीवन है। यह कहीं दूर दूसरी जगह नहीं, किसी चांद पर नहीं, ठीक हमारे साथ है। और हमें कठिनाई यह होती है कि अगर हमारे साथ है तो हमें स्पर्श करना चाहिए, हमें दिखाई पड़ना चाहिए। कभी-कभी हमें स्पर्श भी करता है वह अस्तित्व और कभी-कभी किन्हीं क्षणों में दिखाई भी पड़ता है।
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साधारणतः नहीं, क्योंकि हमारे होने का ढंग और उसके होने के ढंग में बुनियादी भेद है। इसलिए दोनों एक ही जगह मौजूद होकर भी एक-दूसरे को काटने, एक-दूसरे की जगह घेरने का काम नहीं करते।
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जैसे इस कमरे में दीए जल रहे हैं और दीयों के प्रकाश से सारा कमरा भरा हुआ है। और मैं आऊं और एक सुगंधित इत्र यहां छिड़क दूं, तो कोई मुझसे कहे कि कमरा तो प्रकाश से बिलकुल भरा हुआ है, इत्र के लिए जगह नहीं है। इत्र पूरे कमरे में फैल कर इत्र भी सुगंध भर दे अपनी। प्रकाश भी भरा था कमरे में, सुगंध भी भर गई कमरे में। न सुगंध प्रकाश को छूती है, न प्रकाश सुगंध को छूता है, न एक-दूसरे को बाधा पड़ती है इससे कि कमरा पहले से भरा है। उन दोनों का अलग अस्तित्व है। प्रकाश का अपना अस्तित्व है, सुगंध का अपना अस्तित्व है, दोनों एक-दूसरे को न काटते, न छूते; दोनों पैरेलल, समानांतर चलते हैं।
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फिर कोई तीसरा व्यक्ति आए और एक वीणा बजा कर गीत गाने लगे और हम उससे कहें कि कमरा बिलकुल भरा है, वीणा बज नहीं सकेगी, प्रकाश पूरा घेरे हुए है, सुगंध ने एक-एक कोने को घेर दिया है, अब तुम्हारी ध्वनि को जगह कहां है? लेकिन वह वीणा बजाने लगे और ध्वनि भी इस कमरे को भर ले।
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तो ध्वनि को जरा भी बाधा नहीं पड़ेगी इससे कि प्रकाश है कमरे में, कि गंध है कमरे में, क्योंकि ध्वनि का अपना अस्तित्व है। ध्वनि अपनी स्पेस पैदा करती है अलग, उसका अपना आकाश है। गंध का अपना आकाश है, प्रकाश का अपना आकाश है। प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक अस्तित्व का अपना आकाश है और एक दूसरे को काटता नहीं।
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इसलिए जब हमें ये सब सवाल उठते हैं कि कहां रहते हैं देवता, कहां जीते हैं प्रेत, तो हम सदा ऐसा सोचते हैं कि हमसे कहीं दूर! वैसी बात ही गलत है। वे ठीक समानांतर हमारे जी रहे हैं हमारे साथ। और यह बड़ा उचित ही है कि साधारणतः वे हमें दिखाई नहीं पड़ जाते हैं, नहीं तो हमारा जीना बड़ा कठिन हो जाए। और साधारणतः हम उनके स्पर्श में नहीं आते हैं, नहीं तो जीवन बड़ा कठिन हो जाए।
लेकिन किन्हीं घड़ियों में, किन्हीं क्षणों में वे दिखाई भी पड़ सकते हैं, उनका स्पर्श भी हो सकता है, उनसे संबंध भी हो सकता है। और महावीर या उस तरह के व्यक्तियों के जीवन में निरंतर उनका संबंध और संपर्क है, जिसे परंपराएं समझाने में एकदम असमर्थ हैं।
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यह बातचीत ऐसे ही हो रही है जैसे दो व्यक्तियों के बीच हो रही हो--महावीर की या और देवताओं की। उस बातचीत में कहीं भी ऐसा नहीं है कि कोई कल्पना-लोक में बात हो रही हो। यह अत्यंत सामने-आमने बात हो रही है।
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लेकिन किन्हीं घड़ियों में, किन्हीं क्षणों में वे दिखाई भी पड़ सकते हैं, उनका स्पर्श भी हो सकता है, उनसे संबंध भी हो सकता है। और महावीर या उस तरह के व्यक्तियों के जीवन में निरंतर उनका संबंध और संपर्क है, जिसे परंपराएं समझाने में एकदम असमर्थ हैं। यह बातचीत ऐसे ही हो रही है जैसे दो व्यक्तियों के बीच हो रही हो--महावीर की और देवताओं की। उस बातचीत में कहीं भी ऐसा नहीं है कि कोई कल्पना-लोक में बात हो रही हो। यह अत्यंत सामने-आमने बात हो रही है।
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और किसी एक के साथ ऐसा नहीं हो रहा है, बुद्ध के साथ भी वैसा हो रहा है, सारे बुद्धों के साथ भी।
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(कृष्णमूर्ति ने अपनी जीवनी (Years of awakening) में बताया है, की उनकी बहन और मां, मृत्यु बाद उनको पीछे के बगीचे में मिलते थे । कृष्णमूर्ति बताया है , की जब वो स्कूल जाते थे तब उनकी मां का अशरीरी आत्मा उनके पीछे पीछे आता था, और उनके कंगन के आवाज भी उनको सुनाई पड़ते थे...)
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ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे भीतर भी कुछ उनसे संबंधित होने का मार्ग है, लेकिन प्रसुप्त है।
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*ओशो* । (संकलित)
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