*"मनुष्य का भी कोई स्वभाव नहीं है।"*
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*"मनुष्य का भी कोई स्वभाव नहीं है।"*
*मनुष्य का भी कोई स्वभाव नहीं है। जिसे भी हम स्वभाव कहते हैं वह भी सिखाई गई व्यवस्था, सीखे हुए वर्तन में, संस्कार के ढांचे में किया गया आचरण है।*
*इसलिए एक व्यक्ति मांसाहारी के घर में पैदा होता है तो मांसाहार करने लगता है।*
*स्वभाव नहीं है।*
*उसे ही हम शाकाहारी के घर में पाले, वह शाकाहार करेगा और मांस देखकर उसे उल्टी हो जाएगी, वमन हो जाएगा, घबराहट हो —जाएगी ।*
*नहीं, ऐसा मत समझ लेना कि शाकाहारी के घर में जो बड़ा हुआ तो बड़ा गुणी हें।*
*अगर मांसाहारी के घर में बड़ा हुआ तो बड़ा दुर्गुणी है।*
*नहीं, बड़े— होने के भेद हैं। बर्तन का आकार है, वह पकड़ लिया गया है।*
*बचपन से हम हर एक व्यक्ति को कुछ सिखा रहे हैं। वह सिखावन अगर ठीक से समझें तो जीवन में जो अभिनय उसे करना हे, उसकी तैयारी है।*
*जिन्हें —हम शिक्षालय कहते हैं, वह हमारे रिहर्सल के, जहां हम जीवन के अभिनय की तैयारी करते हैं, उसके प्रशिक्षण हे स्थल हैं।*
*परिवार, समाज स्कुल, विश्वविद्यालय — वहां हम तैयार करते हैं एक व्यक्ति को एक ढंग से ऐक्ट करने के लिए।*
*एक व्यक्ति को हम हिंदू की तरह तैयार: करते— है।*
*एक व्यक्ति को हम अमरीकन की तरह तैयार करते हैं।*
*एक व्यक्ति को हम ईसाई की तरह तैयार करते हैं।*
*एक को हम चीनी की तरह तैयार करते हैं।*
*और फिर वे तैयार हो जाते हैं, और कल, कल जब ढांचे उनके मजबूत हो जाते हैं, तो ऐसा लगता है कि यह उनका स्वभाव है।*
*ये सब सिखाए गए अभिनय हैं, जो इतने मजबूती से पकड़ लिए गए कि उनको करते वक्त व्यक्ति को खयाल नहीं आता कि मैं अभिनय कर रहा हूं।*
*कभी आपको खयाल आया कि आप जैन, हिंदू मुसलमान, ईसाई, ये आपके सिखाए गए अभिनय हैं! जो आपको न सिखाए गए होते तो आपने कभी न सीखे होते।*
*लेकिन जब आप कहते हैं, मैं हिंदू हूं तब आप कर्ता बन जाते हैं। तब तलवारें चल सकती हैं। तब जान ली और दी जा सकती है। और अगर कोई कह दे कि हिंदू नहीं हैं आप, तो उपद्रव हो सकता है।*
*_मनस्विद कहते हैं कि वह जो आदत है वह दूसरा स्वभाव है, ऐसा पुराने मनस्विद कहते थे।*
*हैबिट इज दि सेकेंड नेचर।*
*ऐसा पुराने मनस्विद कहते थे।*
*नए मनस्विद कहते हैं,*
*नेचर इज दि फर्स्ट हैबिट।*
*_वह जो स्वभाव है पहली आदत है। सुना है हमने निरंतर कि आदत जो है वह दूसरा स्वभाव है।_*
*_लेकिन जितनी ज्यादा खोज होती है आदमी के स्वभाव की उतना ही पता चलता है कि जिसे हम स्वभाव कहते हैं वह पहली आदत है — बहुत गहरे में बैठ गई।_*
*फिर इतनी मजबूत हो गई कि व्यक्ति भूल गया कि मैं अभिनय कर रहा हूं।*
*अगर आपको याद रहे कि आप अभिनय कर रहे हैं तो छुरेबाजी नहीं होगी।*
*क्योंकि आप कहेंगे, क्या पागलपन है! मैं हिंदू होने का खेल खेल रहा हूं आप मुसलमान होने का खेल खेल रहे हैं, इसमें झगडा कहां है?*
*नहीं, झगड़ा वहां आ जाता है, क्योंकि यह खेल नहीं है, ये गंभीर बातें हैं। यह मामला खेल का नहीं है।*
*एरिक बर्न ने एक किताब लिखी है — गेम्स दैट पीपुल प्ले, खेल जो लोग खेलते हैं।*
*उसमें उसने फुटबाल और हाकी और ताश और कैरम और शतरंज ही नहीं गिनाए, उसमें उसने हिंदू मुसलमान, ईसाई भी गिनाए हैं। वो भी खेल हैं जो लोग खेलते हैं — महंगे पड़ जाते हैं।*
*कभी—कभी शतरंज में भी तलवार चल जाती है, तो अगर हिंदू—मुस्लिम में चल जाती है तो कोई बहुत हैरानी की बात नहीं है।*
*_गंभीरता से पकड़ लिए अभिनय लगते हैं कि जीवन हो गए। और जो—जो सिखा दिया जाता है वह पकड़ लिया जाता है।_*
*सारी दुनिया में स्त्रियों को सिखा दिया गया कि वे पुरुष से हीन हैं, पकड़ लिया। सीख गयीं।*
*हालांकि ऐसे समाज भी हैं मातृ—सत्ताक, जहां सिखाया गया है कि पुरुष स्त्रियों से हीन हैं, तो वहां वैसी बात लोग सीख गए हैं। ऐसे कबीले भी हैं जहां स्त्री श्रेष्ठ है और पुरुष हीन है।*
*और बड़े मजे की बात तो यह है कि जिन कबीलों में यह सिखाया गया कि स्त्री श्रेष्ठ है पुरुष हीन है, वहां पुरुष हीन हो गया है और स्त्री श्रेष्ठ हो गई है।*
*और जहां सिखाया गया कि स्त्री हीन है, वहां स्त्री हीन हो गई है और पुरुष श्रेष्ठ हो गया है। नहीं, पानी की तरह हम बर्तनों में ढाल देते हैं आदमियों को।*
*फिर अभिनय इतने मजबूती से पकड़ लेते हैं अहंकार को कि फिर वह यह नहीं कहता कि मैं अभिनय कर रहा हूं वह कहता है, यह मैं हूं।*
*_यह हिंदू होना मेरा खेल नहीं है,*
*_यह मैं हूं।_*
*और जिस क्षण आपने कहा कि _"मैं हूं"_ उस दिन आपके ऊपर कालिख लगनी शुरू हो गई।*
*और आप पर ही लगे तो भी कम है, जिस आदमी पर कालिख खुद पर लगनी शुरू होती है, वह दूसरों पर भी कालिख फेंकना शुरू कर देता है। कालिख ही होती है हाथ में, वही हम लेन—देन करते हैं।*
*फिर हम खुद भी काले होते हैं, दूसरों को भी काले करते चले जाते हैं। फिर सारी जिंदगी कालिमा से भर जाती है।हम अभिनय को भी कर्ता की तरह करने की तैयारी कर लिए हैं। अब कैसे खेल हैं, लेकिन गहरे बैठ गए हैं। दो छोटे बच्चे एक गुड्डा और गुड्डी का विवाह करवाते हैं, तो हम कहते हैं, खेल खेल रहे हैं।*
*_लेकिन कभी खयाल किया कि एक स्त्री—पुरुष का विवाह भी थोड़े बड़े पैमाने पर, ऑन ए लार्ज स्केल, गुड्डा और गुड्डियों के विवाह से ज्यादा नहीं है! सब रीति—रस्म वही हैं। सब हिसाब वही है, सब व्यवस्था, ढोल—बाजे वही हैं। सब ढोंग, सब इंतजाम वही है।_*
*हा, लेकिन फर्क इतना है कि उसे छोटी उम्र के बच्चे खेलते हैं, इसे बड़ी उम्र के बच्चे खेलते हैं। छोटी उम्र के बच्चे जल्दी भूल जाते हैं। सांझ को भूल जाते हैं, सुबह शादी की थी।*
*ये बड़ी उम्र के बच्चे अदालतों तक में लड़ते हैं, भूलते नहीं हैं, मजबूती से पकड़ लेते हैं।*
🪸🪸🪸 *ओशो* 🪸🪸🪸
*"ईशावास्य उपनिषाद"*
*प्रवचन--03 (वह निमित्त है)*
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