Albert Einstein
Albert Einstein का भी पहले यही मानना था कि ब्रह्मांड स्थिर, शाश्वत एवं सीमित है। मतलब उनका यह मानना था कि ब्रह्मांड हमेशा से ऐसा रहा है और सदैव ही ऐसा रहेगा। यद्यपि आइन्स्टाइन के ही सामान्य सापेक्षता सिद्धांत से यह स्पष्ट हो रहा था कि दिक्-काल या तो सिकुड़ेगा या फिर फैलेगा, मगर स्थिर नहीं रहेगा। आइन्स्टाइन को अपने ही सिद्धांत में स्थिर ब्रह्मांड के पक्ष में संकेत मिलने के बावजूद उसके समर्थन में अपने ही समीकरणों को संशोधित करतेहुए उसमें उन्होंने एक पद जोड़ा, जिसे ब्रहमांडीय नियतांककहते हैं। दरअसल आइन्स्टाइन ने एक विरोधी गुरुत्वाकर्षण बल की कल्पना की थी। जहाँ प्रत्येक गुरुत्वाकर्षण बल का कोई न कोई स्रोत होता है वहीं आइन्स्टाइन द्वारा कल्पित विरोधी गुरुत्वाकर्षण बल का कोई खास स्रोत नहीं था, बल्कि वह दिक्-काल का एक अंतर्निहित अंग था जिसकी प्रकृति और प्रवृत्ति ब्रह्मांड को संकुचित होने से रोकने एवं स्थिरता प्रदान करने की थी।
आइन्स्टाइन के विचारों से रुसी वैज्ञानिक अलक्जेंडर फ्रीडमैन Alexander Friedmann सहमत नहीं थे। उन्होंने वर्ष 1922 में अपने सैद्धांतिक खोजों के आधार पर यह पता लगाया कि ब्रह्मांड के बारे में हमें यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह स्थिर है। वस्तुतः उन्होंने ब्रह्मांड के गतिशील होने की बात रखी!
फ्रीडमैन ने दो महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किए। पहला यह कि ब्रह्मांड हर तरफ, हर दिशा में एक जैसा दिखाई देता है और दूसरा यह कि ब्रह्मांड किसी भी स्थान से देखने पर एक जैसा दिखाई देता है। फ्रीडमैन के ब्रह्माण्डीय मॉडल की दो अवस्थाएं हैं। पहली यह है कि आकाशगंगाएं धीरे-धीरे एक दूसरे से दूर होते जाते हैं परंतु कुछ देर बाद गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें एक-दूसरे से दूर जाने से रोक देता है, तब ये निकट आने लगते हैं इसके कारण फैलाव के स्थान पर संकुचन होगा। दूसरी अवस्था यह है कि आकाशगंगाएं इतनी तीव्र गति से एक दूसरे से दूर होती जा रही हैं कि गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें दूर जाने से रोक नहीं पायेगा, परिणामस्वरूप ब्रह्मांड हमेशा फैलता ही रहेगा।
जिस समय फ्रीडमैन ने उपरोक्त तर्क रखें, उस समय आइन्स्टाइन तथा अन्य वैज्ञानिकों ने उनके तर्कों की उपेक्षा की। लेकिन एडविन हब्बल ने एक ऐसी खोज की कि वैज्ञानिकों को इस बात का ज्ञान हो गया कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है, बल्कि गतिशील है। आइए, उस क्रांतिकारी खोज की चर्चा करते हैं।
फैलता हुआ ब्रह्मांड
बीसवीसदी के प्रारम्भ में कोई भी वैज्ञानिक नहीं जानता था कि तारों से परे ब्रह्मांड का विस्तार कहाँ तक है। वर्ष 1920 में खगोलविदों द्वारा एक अन्तर्राष्ट्रीय विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें ब्रह्मांड के विस्तार एवं आकार पर चर्चा होनी थी। हार्लो शेप्ली Harlow Shapley तथा बहुसंख्य खगोलविद इस मत के पक्ष में थे कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार हमारी आकाशगंगा तक ही सीमित है। दूसरी तरफ हेबर क्यूर्टिस Haber Curtis तथा कुछ थोड़े से लोगों का मानना था कि हमारी आकाशगंगा की ही तरह ब्रह्मांड में दूसरी भी आकाशगंगाएं हैं, जो हमारी आकाशगंगा से अलग अस्तित्व रखती हैं। जैसा कि बड़ी-बड़ी विचार गोष्ठियों में होता है, इस बैठक में भी बहुमत का ही पलड़ा भारी रहा।
परंतु वर्ष 1924 में एडविन हब्बल Edwin Hubble तथा उनके सहयोगियों ने माउंट विल्सन वेधशाला की दूरबीन से यह सिद्ध कर दिया कि इस विराट ब्रह्मांड में हमारी आकाशगंगा की तरह लाखों अन्य आकाशगंगाएं भी हैं। अत: हब्बल के प्रेक्षणों ने क्यूर्टिस के दृष्टिकोण को सही सिद्ध कर दिया। मगर, हब्बल के निरीक्षण केअन्य निष्कर्ष क्यूर्टिस की कल्पना से भी परे के थे। दरअसल वर्ष 1929 में हब्बल ने यह भी खोज की कि दूर की आकाशगंगाओं से प्राप्त होने वाले प्रकाश की तरंग-लंबाई में एक नियमित वृद्धि है।
डॉप्लर प्रभाव के अनुसार जब एक प्रकाश स्रोत हमसे दूर जाता है, तो उससे प्राप्त होने वाले प्रकाश की तरंग-लंबाई में ऐसी ही वृद्धि दिखाई देती है। चूँकि एक सामान्य वर्णक्रम में अधिकतम तरंग-लंबाई लाल रंग और न्यूनतम तरंग-लंबाई नीले-बैंगनी रंग से प्रदर्शित होता है, इसलिए हब्बल द्वारा प्राप्त वर्णक्रम को लाल विचलन कहते हैं। अत: हब्बल ने अपने इस प्रेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला कि दूरस्थ आकाशगंगाएं हमसे दूर भाग रही हैं। हब्बल ने यह भी सिद्ध किया कि आकाशगंगाएं जितनी अधिक दूर है, उनकी दूर जाने का वेग भी उतना ही अधिक है। हब्बल ने इसी आधार पर कहा कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड प्रसारमान है, फ़ैल रहा है!
जैसाकि हम जानते हैं कि आइन्स्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष था कि ब्रह्मांड सिकुड़ेगा या फैलेगा, मगर स्थिर नहीं रहेगा। वर्ष 1927 में जब जार्ज लेमाइत्रे ने सामान्य सापेक्षता के इन निष्कर्षों को आइन्स्टाइन को बताया तो उनकी प्रतिक्रिया थी: ‘लेमाइत्रे, तुम्हारी गणित तो ठीक है परंतु भौतिकी बहुत बुरी।’ आइन्स्टाइन स्थिर ब्रह्मांड के कट्टर पक्षधर थे। परंतु हब्बल की खोज ने सदियों पुरानी उस मान्यता को भी नकार दिया जिसके अनुसार ब्रह्मांड शाश्वत एवं स्थिर है। हब्बल की खोज के बाद आइन्स्टाइन ने कहा कि ब्रह्मांड को स्थिर बनाने के लिए अपने समीकरणों में ब्रह्माण्डीय नियतांक को जोड़ना उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी।
अब वियना के चिकित्सक ओल्बर्स के विरोधाभास पर चर्चा करते हैं। जैसाकि सदियों के प्रेक्षण और हमारा अस्तित्व यह सिद्ध कर रहे थे कि आकाश इतना अधिक प्रकाशमान नहीं हो सकता। तो प्रश्न यह है कि ओल्बर्स के गणनाओं में क्या गलती थी? इसका संक्षिप्त उत्तर है : उन्हें यह नहीं ज्ञात था कि ब्रह्मांड फ़ैल रहा है। दरअसल डॉप्लर प्रभाव के कारण दूर के तारों से प्राप्त होनेवाला प्रकाश और भी अधिक कम हो जाता है तथा इसका योगदान ओल्बर्स द्वारा गणना किये गए अंश से काफी कम हो जाता है। इसलिए इस प्रश्न ‘रातअंधेरी क्यों?’ का उत्तर है : ब्रह्मांड फ़ैल रहा है। आइए, अब ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित आधुनिक सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति का बिग बैंग सिद्धांत
जैसा कि हम जानते हैं कि हब्बल ने यह खोज की थी कि ब्रह्मांड का विस्तार (फैलाव) हो रहा है। उस समय अन्य वैज्ञानिकों के साथ-साथ हब्बल को भी अपनी इस असाधारण खोज के मायने स्पष्ट नहीं थे। इस मुद्दे पर विचार स्वरूप जोर्ज लेमाइत्रे और जोर्ज गैमो ने गंभीर प्रयास किए। इन दोनों वैज्ञानिकों के अनुसार यदि आकाशगंगाएं बहुत तेज़ी से हमसे दूर भाग रहीं हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि अतीत में किसी समय जरुर ये आकाशगंगाएं एक साथ रहीं होंगी।
वस्तुतः ऐसा लगा कि 10 से 15 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड का समस्त द्रव्य एक ही जगह पर एकत्रित रहा होगा। उस समय ब्रह्मांड का घनत्व असीमित (Infinitedensity) था तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक अति-सूक्ष्म बिंदू (Infinitesimally small) में समाहित था। इस स्थिति को परिभाषित करने में विज्ञान एवं गणित के समस्त नियम-सिद्धांत निष्फल सिद्ध हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को गुरुत्वीय विलक्षणता (Gravitational Singularity) नाम दिया है। किसी अज्ञात कारण से इसी सूक्ष्म बिन्दू से एकतीव्र विस्फोट हुआ तथा समस्त द्रव्य इधर-उधर छिटक गया। इस स्थिति में किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रह्मांड का विस्तार शुरू हुआ और दिक्-काल की भी उत्पत्ति हुई। इस घटनाको ब्रह्माण्डीय विस्फोट का नाम दिया गया। अंग्रेज ब्रह्मांड विज्ञानी सर फ्रेड हॉयल Sir Fred Hoyle ने इस सिद्धांत की आलोचना करते समय मजाक में ये शब्द गढ़े- ‘बिग बैंग’।
बिग बैंग सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति का सबसे अधिक मान्य सिद्धांत है। परंतु जिस सैद्धांतिक स्थित पर भौतिकी या गणित प्रकाश डालने में असमर्थ है, उसको मानने के हमारे पास क्या सबूत है? दरअसल भौतिकी को अपने सिद्धांतों पर उस समय संदेह हो जाता है, जब वह उसे अनंत की तरफ ले जाते हैं। बहरहाल, बात सबूत की। वैज्ञानिक जोर्ज गैमो ने 1940 के दशक में यह अनुमान लगाया कि बिग बैंग ने उत्पत्ति के कुछ समय में ब्रह्मांड को उच्च तापमान विकिरण से भर दिया होगा! उन्होंने यह भी अंदाज़ लगाया था कि ब्रह्मांडके विस्तार ने उच्च तापमान विकिरण को धीरे-धीरे ठंडा कर दिया होगा और उसके अवशेष माइक्रोवेव के रूप में देखे जा सकते हैं। वर्ष 1965 में आर्नो पेंजियाज और रोबर्ट विल्सन ने अनजाने में ही माइक्रोवेव विकिरण की खोज की। इस बड़े सबूत के कारण ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बिग बैंग सिद्धांत को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।
स्थायी अवस्था सिद्धांत
बीसवीं सदी के प्रतिभाशाली ब्रह्माण्ड विज्ञानी फ्रेड हॉयल ने अंग्रेज गणितज्ञ हरमान बांडी और अमेरिकी वैज्ञानिक थोमस गोल्ड के साथ संयुक्त रूप से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रस्तुत किया। यह सिद्धांत ‘स्थायी अवस्था सिद्धांत’ (Steady State Theory) के नाम से विख्यात है। इस सिद्धांत के अनुसार, न तो ब्रह्माण्ड का कोई आदि है और न ही कोई अंत। यह समयानुसार अपरिवर्तित रहता है। यद्यपि इस सिद्धांत में प्रसरणशीलता समाहित है, परन्तु फिर भी ब्रह्माण्ड के घनत्व को स्थिर रखने के लिए इसमें पदार्थ स्वत: रूप से सृजित होता रहता है। जहाँ ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सर्वाधिक मान्य सिद्धांत (बिग बैंग सिद्धांत) के अनुसार पदार्थों का सृजन अकस्मात हुआ, वहीं स्थायी अवस्था सिद्धांत में पदार्थोँ का सृजन हमेशा चालू रहता है।
हॉयल ने बिग बैंग सिद्धांत के अवधारणाओं के साथ असहमति क्यों प्रकट की? दरअसल हॉयल जैसे दार्शनिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए ब्रह्माण्ड के आदि या आरम्भ जैसे विचार को मानना अत्यंत कष्टदायक था। ब्रह्माण्ड के आरम्भ (सृजन)के लिए कोई कारण और सृजनकर्ता (कर्ता) होना चाहिये। वर्तमान में इस सिद्धांत केसमर्थक न के बराबर हैं।
दोलायमान ब्रह्मांड सिद्धांत
ब्रह्मांड की उत्पत्ति का यह एक नया सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारा ब्रह्मांड करोड़ों वर्षों के अंतराल में विस्तृत और संकुचित होता रहता है। डॉ. एलन संडेज Dr. Allan Sandage इस सिद्धांत के प्रवर्तक हैं। उनका मानना है कि आज से 120 करोड़ वर्ष पहले एक तीव्र विस्फोट हुआ था औरतभी से ब्रह्मांड फैलता जा रहा है। 290 करोड़ वर्ष बाद गुरुत्वाकर्षण बल के कारणइसका विस्तार रुक जाएगा। इसके बाद ब्रह्मांड संकुचित होने लगेगा और अत्यंत संपीडित और अनंत रूप से बिंदुमय आकार धारण कर लेगा, उसके बाद एक बार पुनः विस्फोट होगा तथा यह क्रम चलता रहेगा! इस सिद्धांत को दोलायमान ब्रह्मांड सिद्धांत (Oscillating Universe theory) कहते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमने लेख के शुरू में उठाए गये सभी मूलभूत प्रश्नों के उत्तर पा लिए हैं? नहीं! हम किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं ढ़ूंढ़ पाये हैं। इससे यह साबित होता है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे मे कोई भी सिद्धांत संपूर्ण नहीं है। वास्तव में हम ब्रह्मांड के बारे में केवल 4% ही जानते हैं, बाकी 96% के बारे में हमें न के बराबर जानकारी है। इसलिए इस जानकारी के आभाव में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में कोई भी मान्यता अभी अधूरी है। अत: ब्रह्मांड की उत्पत्ति के इन नवीन सिद्धांतों में सुधार की अभी काफी गुंजाइश है!
Comments
Post a Comment